सुबह से ही टकटकी लगाये बैठा हूँ
कभी दरवाजे को, तो कभी सुनी गलियों को निहारता हूँ
हर पल लगता है, जैसे अभी दरवाजे पर दस्तक होगी
और तुम्हारा चेहरा सामने होगा
इंतज़ार की घडियां बढ़ रही है
दिल भी बेकल हो रहा है
सैकडों अंदेशे सामने आ रहे हैं
तुम न आकर, ये कैसी सज़ा मेरे दिल को दे रही हो
दिल ये पूछता है, कहाँ रह गयी हो तुम
तुम आती क्यों नहीं ?
क्या भूल गए वो वादा, क्या बदल गया तुम्हारा इरादा ?
आज ही तो रविवार है
तुम्हारे आने का सुबह से इंतज़ार है
वक्त कह रहा है तुम नहीं आओगी
पर दिल कह रहा है तुम ज़रूर आओगी
तुम आओगी क्योंकि तुम मेरे दिल में हो
और सच तो ये है मैं भी तुम्हारे दिल में हूँ
बीतता जा रहा है ये पल
बढता जा रहा है मेरा गम
अंदेशों की सैकडों मीनारें खड़ी हो चुकी है
दिल का विश्वास भी डगमगा रहा है
कुछ क्षण मैं और रुकुंगा
सांसों की डोर मैं अभी छोरुगा
पर तुम मेरे विश्वास को तोड़ न देना
झूठा ही सही, इक बार तुम चली आना।
Sunday, March 8, 2009
Subscribe to:
Comments (Atom)