अँखियाँ खोये जब धीर
और गंगा के हो तीर
और पूरबा गए प्रेम के गीत
तब तुम आना बन मनमीत, चली आना तुम मनमीत ।
जब बसंत की हो धूम
और फूल हँसे झूम झूम
और कोयल गाये कूक कूक
तब तुम आना बन मनमीत, चली आना तुम मनमीत ।
जब सावन की हो हलकी फुहार
और चांदनी सी हो रात
और आसमान पर हो तारों की बरात
तब तुम आना बन मनमीत, चली आना तुम मनमीत ।
जब तुमसे मिलने की हो आस
और तुम्हारी याद सताए दिन रात
और शहनाई गूंजे सारी रात
तब तुम आना बन मनमीत, चली आना तुम मनमीत ।