उनके साथ न होने के ख्याल से हीं
भङक उठती है अकेलेपन के अहसास की चिंगारी।
ये चिंगारी सुलगती रहती है जैसे
चिता के राख से लिपटकर सुलगती है एक चोटी सी चिंगारी.
ये चिंगारी पहले दिल को दुखाती है
फिर धीरे धीरे ये जिस्म को खोखला करती है
फिर अंत में ये प्राण को भी हर लेती है।
हम अकेलेपन के इस अहसास से बचने के लिए क्या नहीं करते
कभी हम यादों के दिये जलाते हैं
तो कभी हम यादों के मयकदों में जाते हैं।
पर अफ़सोस, ये अहसास हमे एक पल के लिए भी आजाद नही करता
हाँ सच ही तो है हम गुलाम हैं तुम्हारे।
Sunday, February 8, 2009
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