तुम कहते सावन आया है
मैं कहता छत टपक रहा।
तुम कहते मन मोहता बारिश
मैं कहता तन भीग रहा।
तुम कहते चलो बागों में
मैं कहता साँझ ढल रही।
तुम कहते रमणीक बेला है
मैं कहता मृगतृष्णा है।
तुम ही बताओ अब प्रिये
कैसी ये संवेदना है?
मैं कहता छत टपक रहा।
तुम कहते मन मोहता बारिश
मैं कहता तन भीग रहा।
तुम कहते चलो बागों में
मैं कहता साँझ ढल रही।
तुम कहते रमणीक बेला है
मैं कहता मृगतृष्णा है।
तुम ही बताओ अब प्रिये
कैसी ये संवेदना है?
लाज़बाब तुलनात्मक चित्रण
ReplyDeleteअभिव्यक्ति का अंदाज बहुत सशक्त है.
ReplyDeleteहिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.
मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.
हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.
शुभाशिष !
-- शास्त्री (www.Sarathi.info)
Vikrant ji
ReplyDeletesamvedana ki koi bhasha nh hoti
usko pratyek vyakti apne drishtikoN se hi dekhta hai
apne nazariye se
आपका स्वागत है ब्लॉग जगत में ,और आपके निरंतर लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ........
ReplyDeleteवाह विक्रांत भाई वाह सीधे शब्द गहरे अर्थ। आपका स्वागत है।
ReplyDeletekya baat hai sir jee. narayan narayan
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना है।बधाई।
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