Monday, February 16, 2009

संवेदना

तुम कहते सावन आया है
मैं कहता छत टपक रहा।

तुम कहते मन मोहता बारिश
मैं कहता तन भीग रहा।

तुम कहते चलो बागों में
मैं कहता साँझ ढल रही।

तुम कहते रमणीक बेला है
मैं कहता मृगतृष्णा है।

तुम ही बताओ अब प्रिये
कैसी ये संवेदना है?

7 comments:

  1. लाज़बाब तुलनात्मक चित्रण

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  2. अभिव्यक्ति का अंदाज बहुत सशक्त है.

    हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

    मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

    हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

    शुभाशिष !

    -- शास्त्री (www.Sarathi.info)

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  3. Vikrant ji
    samvedana ki koi bhasha nh hoti
    usko pratyek vyakti apne drishtikoN se hi dekhta hai
    apne nazariye se

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  4. आपका स्वागत है ब्लॉग जगत में ,और आपके निरंतर लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ........

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  5. वाह विक्रांत भाई वाह सीधे शब्द गहरे अर्थ। आपका स्वागत है।

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  6. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

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